January 16, 2026

भारत देश प्रारंभ से ही ज्ञान विज्ञान योग आदि से रहा परिपूर्ण: डॉ जयपाल

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रुड़की/लंढौरा (देशराज पाल/राजपाल)। चमन लाल महाविद्यालय में आदि गुरु शंकराचार्य का भारतीय संस्कृति में योगदान विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। यह व्याख्यान भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद द्वारा संपोषित था। कार्यक्रम की शुरुआत महाविद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष रामकुमार शर्मा सचिव अरुण हरित ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड राज्य सरकार में उच्च शिक्षा उन्नयन समिति मंत्री  डॉ. जयपाल सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत देश प्रारंभ से ही ज्ञान विज्ञान योग आदि से परिपूर्ण रहा है। जब जब सनातन धर्म में विसंगतियां आने लगी तब तब संत ऋषि मुनियों आदि शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग से डॉ. बबलू वेदअलंकार ने अपने संबोधन में कहा की आदि गुरु शंकराचार्य ने शास्त्र परंपरा को प्रारंभ किया इसके अंतर्गत हम जीवन की सुंदर कल्पना कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था किसी भी ग्रंथ में नहीं मिलती है केवल वर्ण व्यवस्था को ही प्राथमिकता प्रदान की गई थी।  द्वैत एवं अद्वैत की भावना पर भी प्रकाश डाला। मनुष्यता को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि विश्वास श्रद्धा व मधुर संबंध और प्रेम की भावना से ही मनुष्यता जीवंत रहती है। महर्षि कणाद के अनुसार जो दूसरों की मदद करें वह धर्म तथा जो बुरा करे वह अधर्म यदि व्यक्ति समस्त दुखों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे दर्शन की ओर जाना होगा जीवन के आंतरिक संगीत से ही व्यक्ति शांति को प्राप्त हो सकता है तथा उसमें साधना का दिव्य प्रकाश पैदा हो सकता है। कितना भी वैभव प्राप्त हो जाए लेकिन अंदर का सुख और शांति साधना के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। दूसरे वक्ता के रूप में देव संस्कृति विश्वविद्यालय से प्रोफेसर कृष्णा झरे ने अपने संबोधन में कहा कि महापुरुषों का अलौकिक जीवन मूर्त रूप में कम दिखाई देता है। किसी महापुरुष के जीवन चरित्र को समझने के लिए चार अवस्थाएं होती हैं। जन्मकाल की अवस्थाएं में कुछ चिन्ह प्रतीत होते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने बाल्यावस्था से ही अनेक तीर्थों की यात्रा की तथा अनेक ग्रंथ उपनिषद् आदि की रचनाएं की चार मठों की स्थापना कर सनातन संस्कृति के उच्च आदर्शों की स्थापना की। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सुशील उपाध्याय ने अपने संबोधन में प्रेमानंद महाराज का जिक्र करते हुए ईश्वर को सभी में देखना वास्तव में समता की दृष्टि को विकसित करता है। उत्तराखंड सरकार में राज्य मंत्री देशराज कर्णवाल ने आदि गुरु शंकराचार्य को शिखर पुरुष बताया और भारतीय संस्कृति में उनके योगदान को कभी बुलाया नहीं जा सकता। मंच का संचालन आशुतोष शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. श्वेता ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

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