हिंदी दिवस पर विशेष: हिंदी का मान—भारत का सम्मान
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*आइए, इस हिंदी दिवस पर अपनी मातृभाषा को केवल एक दिन का उत्सव नहीं, जीवन भर की विरासत बनाएँ।*
सन् 1949 में आज ही के दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन हिंदी की यात्रा उस दिन से शुरू नहीं हुई। उसकी जड़ें तो उस भारत की मिट्टी में बहुत पहले से थीं, जहाँ माँ की लोरी में उसका स्वर था, लोकगीतों में उसकी मिठास थी, किसान की पुकार में उसकी सहजता थी और संतों की वाणी में उसकी निर्भीकता।
कबीर के दोहों में उसकी चेतना थी, तुलसी की चौपाइयों में उसकी करुणा, सूर के पदों में माधुर्य और मीरा के विरह में प्रेम की अग्नि। हिंदी किसी सभा-मंच की उपज नहीं है; वह लोक-जीवन की सहज वाणी है।
हिंदी को केवल एक भाषा मान लेना शायद उसके साथ न्याय नहीं होगा।
हिंदी स्मृति है, संस्कार है, संस्कृति की अविरल धारा है और हमारे जीवन की वह आत्मीय लय है, जिसमें हम संसार से ही नहीं, स्वयं से भी संवाद करते हैं।
उसकी सुंदरता इसी विविधता में है। भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली और न जाने कितनी लोक-वाणियों की सुगंध लेकर हिंदी आगे बढ़ती रही है। जैसे अनेक धाराएँ मिलकर नदी को विराट बनाती हैं, वैसे ही इन लोकस्वरों ने हिंदी को समृद्ध किया है। वह जितनी विविध है, उतनी ही एक; जितनी पुरानी है, उतनी ही जीवंत और नई।
हिंदी को शब्दकोश में खोजने से अधिक उसे जीवन में महसूस करना चाहिए।
वह गाँव की पगडंडी पर चलती है, खेत की मेड़ पर गूँजती है, चौपाल में बैठती है, मंदिर की प्रार्थना में उठती है और घर के आँगन में पीढ़ियों की स्मृतियाँ सँजोती है। हमारे रिश्तों में तो हिंदी जैसे साँस बनकर रहती है।
‘माँ’ केवल एक शब्द नहीं—ममता का पूरा संसार है।
‘पिता’ केवल संबोधन नहीं—आशीर्वाद की छाया है।
‘भाई’, ‘बहन’, ‘दादी’, ‘नानी’, ‘ताऊ’, ‘चाचा’, ‘मामा’—ये शब्द नहीं, हमारे संबंधों की धड़कनें हैं।
इसीलिए हिंदी हमारे लिए केवल बोलने की भाषा नहीं, जीने की शैली है।
आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, नई भाषाएँ सीखना और संसार से संवाद करना आवश्यक है। अंग्रेजी सीखना भी ज्ञान का विस्तार है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन अपनी भाषा की कीमत पर किसी दूसरी भाषा को अपनाना ज्ञान नहीं, आत्म-विस्मरण है।
अपनी भाषा बोलने में संकोच कैसा?
जिस भाषा में माँ ने पहली बार पुकारा, उसे बोलने में झिझक कैसी?
जिस भाषा में हमारे पूर्वजों ने सपने देखे, उसे सम्मान देने में संकोच कैसा?
जिस वृक्ष की जड़ें अपनी मिट्टी में गहरी होती हैं, वही आकाश को छूने का साहस करता है।
इसलिए हिंदी का सम्मान किसी दूसरी भाषा का विरोध नहीं है। यह अपनी जड़ों, अपनी स्मृतियों और अपनी पहचान को स्वीकार करने का भाव है।
आज हिंदी दिवस पर केवल शुभकामनाएँ देकर आगे न बढ़ें। अपने बच्चों से हिंदी में बात करें, हिंदी की पुस्तकें पढ़ें, हिंदी में लिखें, अपनी लोकभाषाओं पर गर्व करें और आने वाली पीढ़ी को यह विश्वास दें कि अपनी भाषा बोलना पिछड़ापन नहीं, अपनी जड़ों से जुड़े होने का गौरव है।
और अंततः…
जब जीवन की सारी भाग-दौड़ थम जाएगी, जब पद, प्रतिष्ठा और संसार की चमक पीछे छूट जाएगी, तब मनुष्य उन्हीं आवाज़ों की ओर लौटेगा, जिनमें उसे अपना घर सुनाई देता है।
किसी माँ की पुकार में…
किसी पिता के आशीर्वाद में…
किसी बहन की आत्मीयता में…
किसी भाई के भरोसे में…
किसी बेटी की विदाई के आँसुओं में…
और उन सभी आवाज़ों के बीच कहीं हिंदी चुपचाप धड़कती मिलेगी।
क्योंकि हिंदी हमने केवल सीखी नहीं है—
हिंदी ने हमें हमारी पहचान दी है।
हिंदी हमारी बोली नहीं, हमारी आवाज़ है।
हिंदी हमारा शब्द नहीं, हमारी संवेदना है।
हिंदी हमारा परिचय नहीं, हमारा स्वाभिमान है।
हिंदी हमारी स्मृति है, हमारे संस्कार हैं, हमारे संबंधों की आत्मीय डोर है।
हिंदी केवल भाषा नहीं—
हमारी माँ की आवाज़ है,
हमारी मिट्टी की महक है,
हमारी संस्कृति की जीवित धारा है,
और भारत के हृदय की वह धड़कन है,
जिसके बिना हमारी पहचान अधूरी है।
आइए, इस हिंदी दिवस पर अपनी मातृभाषा को केवल एक दिन का उत्सव नहीं, जीवन भर की विरासत बनाएँ।
।। हिंदी हमारी आत्मा, हिंदी हमारा प्राण ।।
*अरविन्द भारद्वाज*
