November 2, 2026
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रुड़की (देशराज पाल)। हिमालयी क्षेत्र में मौसमी जल संकट की समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की ने उत्तराखंड के टिहरी जिले के ऊंचौन गांव में एक नए जलस्रोत का विकास किया है। इस पहल के परिणाम स्वरूप कम जल उपलब्धता वाले मौसम में पेयजल की उपलब्धता लगभग 500 लीटर से बढ़कर प्रतिदिन 1,000 लीटर या उससे अधिक हो गई है। यह दर्शाता है कि हिमालयी जलस्रोत प्रणालियों की वैज्ञानिक समझ ग्रामीण जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करने में किस प्रकार सहायक हो सकती है।
यह पहल टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों का पुनर्जीवन परियोजना का हिस्सा है। इस परियोजना को नमामि गंगे, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित किया गया है।आईआईटी रुड़की इस परियोजना का प्रमुख संस्थान है तथा पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य इसके प्रधान अन्वेषक हैं। यह हस्तक्षेप लघु हिमालय क्षेत्र में स्थित तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में किए गए दो अनुसंधान अध्ययनों के निष्कर्षों पर आधारित है। यह क्षेत्र अलकनंदा नदी बेसिन के अंतर्गत लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दोनों अध्ययन जलस्रोतों के पुनर्भरण को नियंत्रित करने वाली जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं तथा भूजल की रासायनिक संरचना को प्रभावित करने वाले भूवैज्ञानिक कारकों का विश्लेषण करते हैं। पहला अध्ययन, स्थिर एवं रेडियो समस्थानिकों के माध्यम से अलकनंदा नदी बेसिन में जलस्रोत पुनर्भरण की गतिशीलता से जुड़ी जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं का विश्लेषण, 12 अक्टूबर 2026 को हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ। स्थिर समस्थानिकों, ट्रिटियम मापन और जल-मौसम विज्ञान संबंधी आंकड़ों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने जलस्रोतों के पुनर्भरण की गतिशीलता और भूजल के स्रोतों का अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार, जलस्रोतों के पुनर्भरण में लगभग 82 प्रतिशत योगदान मानसूनी वर्षा का है, जबकि शीतकालीन और मानसून-पूर्व वर्षा का योगदान क्रमशः लगभग 10 प्रतिशत और 8 प्रतिशत है। ये निष्कर्ष विभिन्न मौसमों में जलस्रोत प्रणालियों को बनाए रखने में मानसूनी जल के अंतःप्रवेश और भूजल भंडारण के महत्व को रेखांकित करते हैं।
दूसरा अध्ययन हिमनद-विहीन लघु हिमालयी जलस्रोत प्रणाली में मौसमी अपक्षय प्रक्रियाओं पर शैलविज्ञान संबंधी नियंत्रण, वर्ष 2026 में एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री में प्रकाशित हुआ। यह अध्ययन विश्लेषण करता है कि भूवैज्ञानिक संरचनाएं और मौसमी अपक्षय प्रक्रियाएं जलस्रोतों के पानी की रासायनिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। शोध में कार्बोनेट शैलों का अपक्षय, मौसमी पुनर्भरण और मानवीय गतिविधियों को जल की रासायनिक विशेषताओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में पहचाना गया है।
दोनों अध्ययन मिलकर उन प्रक्रियाओं की पूरक जानकारी प्रदान करते हैं जो जलस्रोतों का पुनर्भरण करती हैं और उनकी जल गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।

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