ग्रामीण प्रौद्योगिकियों को वैज्ञानिक नवाचार से आगे बढ़कर व्यावहारिकता, वहनीयता, अनुकूलनशीलता और व्यापक स्तर पर अपनाए जाने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए:प्रो. अजय सूद
|
Getting your Trinity Audio player ready...
|

*रूटा-जी 2.0 की वार्षिक समीक्षा बैठक में ग्रामीण प्रौद्योगिकियों को प्रयोगशाला से जमीनी स्तर तक पहुंचाने पर केंद्रित*
रुड़की (देशराज पाल)। आईआईटी रुड़की एनसी निगम हाल में पत्रकारों से संवाद करते हुए प्रो. अजय कुमार सूद, भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ने कहा कि ग्रामीण प्रौद्योगिकियों को वैज्ञानिक नवाचार से आगे बढ़कर व्यावहारिकता, वहनीयता, अनुकूलनशीलता और व्यापक स्तर पर अपनाए जाने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए, ताकि जमीनी स्तर पर सार्थक प्रभाव उत्पन्न किया जा सके। उन्होंने प्रयोगशालाओं में किए जा रहे उच्च स्तरीय अनुसंधान को ग्रामीण समुदायों, घरों, कृषि क्षेत्रों और अन्य जमीनी अनुप्रयोगों के लिए व्यावहारिक समाधानों में परिवर्तित करने में रुटा-जी की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने ग्रामीण प्रौद्योगिकियों को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए जमीनी स्तर पर तैनाती को मजबूत करने, सामुदायिक सहभागिता बढ़ाने, क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियों का समाधान करने तथा आत्मनिर्भर स्थानीय उद्यम मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। वहीं ग्रामीण प्रौद्योगिकी कार्य समूह (रूटा-जी 2.0) की तीसरी वार्षिक समीक्षा बैठक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की में शुरू हुई। यह बैठक 25 सितंबर 2026 को आयोजित की जा रही है।
बृहस्पतिवार को आईआईटी रुड़की के एनसी निगम हाल में पत्रकारों से संवाद करते हुए प्रो. अजय कुमार सूद ने कहा कि ग्रामीण प्रौद्योगिकी का वास्तविक प्रभाव इस बात में निहित है कि वह प्रयोगशाला से आगे बढ़कर वास्तविक जरूरतों का प्रभावी ढंग से समाधान कर सके। रूटा-जी के अंतर्गत विकसित प्रौद्योगिकियां व्यावहारिक, वहनीय, अनुकूलनशील और व्यापक स्तर पर अपनाए जाने योग्य होनी चाहिए, ताकि वे जमीनी स्तर पर स्थायी प्रभाव उत्पन्न कर सकें। डॉ. परविंदर मैनई, वैज्ञानिक सचिव, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय, ने रूटा-जी 2.0 के अंतर्गत शैक्षणिक अनुसंधान, तकनीकी विकास और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच निर्बाध और परिणामोन्मुखी जुड़ाव की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक नवाचार की सफलता उसके प्रभावी अंगीकरण, निरंतर उपयोग और अंतिम उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले ठोस प्रभाव में परिलक्षित होनी चाहिए। उन्होंने ग्रामीण कारीगरों, किसानों और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करते हुए निरंतर फीडबैक तंत्र के महत्व को भी रेखांकित किया। आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रुड़की, आईआईटी गुवाहाटी, हैदराबाद और कश्मीर स्थित रूटा-जी केंद्रों के प्रतिनिधि परियोजनाओं की प्रगति का आकलन करने, जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करने तथा टिकाऊ और व्यापक स्तर पर अपनाई जा सकने वाली ग्रामीण प्रौद्योगिकियों के लिए रणनीतियां तैयार करने हेतु बैठक में भाग ले रहे हैं। बैठक में प्रमुख आईआईटी एवं वैज्ञानिक संस्थानों के शोधकर्ता, वैज्ञानिक और अधिकारी मौजूद रहे, ताकि रूटा-जी 2.0 के अंतर्गत विकसित की जा रही तकनीकी पहलों की प्रगति की समीक्षा की जा सके, जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की जा सके तथा टिकाऊ और व्यापक स्तर पर अपनाई जा सकने वाली ग्रामीण प्रौद्योगिकियों के लिए रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया जा सके। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. अजय कुमार सूद, भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ने की। इस अवसर पर डॉ. परविंदर मैनई, वैज्ञानिक सचिव, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय; प्रो. कमल किशोर पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की; प्रो. विवेक मलिक, डीन (SRIC), आईआईटी रुड़की; तथा प्रो. एस. के. सिंगल, PI, RuTAG आईआईटी रुड़की उपस्थित रहे।
