सावन विशेष:महादेव विरोधाभासों में समरसता का दिव्य स्वरूप
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*🕉️🔱सनातन धर्म में भगवान शिव को केवल देवताओं के देव महादेव ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के आश्रयदाता के रूप में माना गया है। वे किसी एक वर्ग, जाति, सम्प्रदाय या प्राणी मात्र के नहीं, बल्कि देव, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, नदी, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा—समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं। इसी कारण उन्हें विश्वनाथ कहा जाता है।*
*🕉️🔱भगवान शिव का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल एक पक्ष का नाम नहीं है। जहाँ संसार विरोधाभास देखता है, वहाँ शिव अद्भुत समरसता का दर्शन कराते हैं। उनके व्यक्तित्व में राग भी है और वैराग्य भी; करुणा भी है और संहार की शक्ति भी; गृहस्थ जीवन भी है और संन्यास का आदर्श भी।*
*उनके वामभाग में माता पार्वती विराजमान हैं। यह गृहस्थ जीवन, प्रेम और शक्ति का प्रतीक है। वहीं उनकी जटाओं में बहने वाली माँ गंगा ज्ञान, भक्ति और आत्मशुद्धि की धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक ओर पत्नी के प्रति अटूट प्रेम है, दूसरी ओर समस्त संसार के कल्याण के लिए पूर्ण समर्पण। यही शिव का अद्वितीय संतुलन है।*
*🕉️🔱श्रीमद्भागवत महापुराण (षष्ठ स्कन्ध) में राजा चित्रकेतु का प्रसंग मिलता है। उन्होंने भगवान शिव को सभा में माता पार्वती को अंक में बैठाए देखकर आश्चर्य प्रकट किया। तब माता पार्वती ने समझाया कि भगवान शिव बाहरी आचरण से नहीं, बल्कि पूर्ण आत्मज्ञान और समदृष्टि से युक्त हैं। उनके प्रत्येक कार्य का उद्देश्य लोककल्याण है, न कि इन्द्रिय-भोग।*
*🕉️🔱भगवान शिव को कामारि कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने कामदेव का दहन किया था। फिर भी वे माता पार्वती के साथ आदर्श गृहस्थ हैं। इससे शिक्षा मिलती है कि धर्मसम्मत गृहस्थ जीवन और इन्द्रिय-विकार में बहुत अंतर है। शिव विषयों के दास नहीं, बल्कि उनके स्वामी हैं।*
*🕉️🔱उनके शरीर पर भस्म लगी रहती है। भस्म हमें स्मरण कराती है कि संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। एक दिन सब कुछ इसी भस्म में परिवर्तित हो जाएगा। इसलिए अहंकार, लोभ और मोह का त्याग करके ईश्वर की शरण में जाना ही जीवन का सार है।*
*🕉️🔱शिवपुराण में भगवान शिव को वैराग्य का सर्वोच्च स्वरूप बताया गया है। दूसरी ओर वही शिव अपने भक्तों के लिए अत्यंत करुणामय और शीघ्र प्रसन्न होने वाले आशुतोष हैं। यही कारण है कि देवता, ऋषि, दानव और सामान्य मनुष्य—सभी उनकी शरण में आते हैं।*
*🕉️🔱समुद्र मंथन से निकला प्रचंड हलाहल विष जब सम्पूर्ण सृष्टि को नष्ट करने लगा, तब भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण वे नीलकण्ठ कहलाए। उन्होंने विष को न तो निगला और न ही बाहर उगला, क्योंकि दोनों स्थितियों में सृष्टि का अहित होता। यह घटना हमें सिखाती है कि महान व्यक्ति समाज की पीड़ा को स्वयं सह लेते हैं, पर दूसरों को संकट में नहीं पड़ने देते।*
*🕉️🔱उनके मस्तक पर सुशोभित चन्द्रमा शीतलता, संतुलन और अमृतत्व का प्रतीक है। वहीं तीसरा नेत्र ज्ञान और दिव्य विवेक का प्रतीक है। जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब यही तीसरा नेत्र प्रलयकारी अग्नि बनकर अधर्म का नाश करता है। इसलिए शिव करुणा और न्याय—दोनों के अद्भुत संगम हैं।*
*🕉️🔱भगवान शिव के गले में सर्प विराजमान है। सामान्य व्यक्ति सर्प से भयभीत होता है, किंतु शिव उसे आभूषण के रूप में धारण करते हैं। इसका अर्थ है कि जिसने अपने भय, क्रोध और वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली, उसके लिए संसार का कोई भी भय शेष नहीं रहता।*
*🕉️🔱वे श्मशान में निवास करते हैं, भूत-प्रेतों के भी स्वामी हैं और साथ ही समस्त देवताओं द्वारा पूजित महादेव भी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर किसी से भेदभाव नहीं करते। उनके लिए ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, देव-असुर का भेद नहीं है। जो भी श्रद्धा से उनकी शरण में आता है, वह उनका अपना बन जाता है।*
*🚩🕉️भगवद्गीता (9.29) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—”समोऽहं सर्वभूतेषु” अर्थात् मैं सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित हूँ। यही समदृष्टि भगवान शिव के स्वरूप में भी दिखाई देती है।*
*🕉️🔱भगवान शिव का संपूर्ण जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा धर्म किसी एक पक्ष को पकड़ लेना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष में संतुलन स्थापित करना है। प्रेम हो, पर आसक्ति न हो; वैराग्य हो, पर कठोरता न हो; शक्ति हो, पर अहंकार न हो; ज्ञान हो, पर करुणा भी बनी रहे।*
*🕉️🔱इसीलिए ऋषियों ने उन्हें विश्वनाथ, महादेव, मृत्युञ्जय, आशुतोष और शम्भु जैसे अनेक नामों से पुकारा है। उनके प्रत्येक नाम में एक गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है।*
*🕉️🔱सावन के इस पावन सोमवार पर हम भी भगवान शिव से यही प्रार्थना करें—*
*🕉️🔱”हे भोलेनाथ! हमारी बुद्धि सीमित है, आपकी महिमा अनन्त है। हमें ऐसा विवेक दीजिए कि हम जीवन के प्रत्येक विरोधाभास में भी आपकी समरसता का दर्शन कर सकें। हमारे भीतर भक्ति, वैराग्य, करुणा और धर्म का प्रकाश सदैव बना रहे।*
हर-हर महादेव!
