चमन लाल महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र की भूमिका पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
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रुड़की (देशराज पाल)। चमन लाल महाविद्यालय में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी जिसका शीर्षक स्वास्थ्य और कल्याण को पुनः परिभाषित करने में दर्शन की भूमिका का आयोजन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद द्वारा संपोषित गृह विज्ञान विभाग एवं जंतु विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया।
शनिवार को मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर मनोज किशोर पंत सचिव, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी से आमंत्रित किए गए। उन्होंने कहा कि दर्शन को सिद्ध करने से स्वास्थ्य और कल्याण सिद्ध हो जाता है। हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बन जाते हैं।इसलिए अच्छा साहित्य पढ़ना चाहिए। गरीबी में पैदा होना दुर्भाग्य नहीं है अपितु गरीबी में मर जाना हमारी ही विफलता का कारण है। उन्होंने कर्म को ही प्रधान बताया।मुख्य वक्ता के रूप में डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून से आमंत्रित प्रोफेसर राम विनय सिंह ने कहा कि मन की प्रसन्नता ही सुखों का मूल है। मन ही मोक्ष का कारण है। मन ही बंधन का कारण है। मन ही दर्शन की उत्पत्ति का कारण भी है। उन्होंने दर्शन की भाव रूप, करण रूप और अधिकरण रूप में व्याख्या की l विचार शक्ति ही दर्शन को जन्म देती है। दुख है तभी दर्शन उत्पन्न होता है l उन्होंने भगवान बुद्ध की वाणी का भी जिक्र किया। मन ही स्वस्थ रखता है मन ही प्राण रूप है। मन आधार है और मन से सूक्ष्म प्राण है। प्राण की सूक्ष्मता से मन बनता है और मन से सूक्ष्म विज्ञान है और विज्ञान से सूक्ष्म आनंद है। उन्होंने कार्य में कुशलता और दक्षता को अनिवार्य बताया। अच्छे और बुरे कार्यों की पहचान स्वयं करें। धर्म वही है जो स्वयं को धारण करें। क्षमा अस्तेय, अपरिग्रह शूचिता पर भी प्रकाश डाला। विद्या और अविद्या को परिभाषित करते हुए उन्होंने बताया कि लोक से ऊपर का ज्ञान विद्या है और मृत्यु लोक का ज्ञान अविद्या है। योग दर्शन शुद्धिकरण का विज्ञान है। योग का मार्ग ही अनुशासन एवं एकाग्र अवस्था तक ले जाता है। उन्होंने योग न्याय मीमांसा वैश्विक दर्शनशास्त्र की व्याख्या भी की। अंत में उन्होंने काव्यात्मक पाठ से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। दूसरे वक्ता के रूप में डॉ. मधु शर्मा चिन्मय डिग्री कॉलेज हरिद्वार ने गंगा प्रदूषण को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की नदियों का जल प्रदूषण दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है। जैव विविधता को लेकर भी उन्होंने अनेकों प्रसंग रखें। सतत विकास के लिए जल प्रदूषण को रोकना अनिवार्य है। इसलिए यह हम सभी का दायित्व है निर्मल गंगा की धारा अविरल बहे। बैक्टीरिया और फंगस भी गंगा के जल का शोधन करते हैं। इस पर भी उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए। शोधार्थी रेनू टंडन ने कैंसर थेरेपी पर अपने विचार रखें। इस अवसर पर महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सुशील उपाध्याय ने अपनी महाविद्यालय की विगत वर्षों की उपलब्धियां का जिक्र किया साथ ही गोरखनाथ की पंक्ति का भी जिक्र किया और योग दर्शन से मानसिक शांति एवं आयुर्वेद की जीवन शैली का भी वर्णन किया। महाविद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष रामकुमार शर्मा ने अपने संबोधन में छात्र-छात्राओं को धैर्य और अनुशासन पर चलने के लिए आवाहन किया तथा सभी अतिथियों का शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका स्वागत और अभिनंदन किया। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. नीतू गुप्ता एवं डॉ. विधि त्यागी ने सभी अतिथियों का अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया और मंच का संचालन आशुतोष शर्मा हिंदी विभाग द्वारा किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त शिक्षक एवं शिक्षिकाएं एवं गैर शिक्षक कर्मचारी भी उपस्थित रहे।
